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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 100–102

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 100–102 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 100-102

संस्कृत श्लोक

संधिरप्यविलोपः स्यादेतयोरेव तद्वपुः । भावाभावैर्यथैकास्थानिष्ठावेतौ तथैव हि ॥ १०० ॥ द्वाभ्यां चैतन्यजाड्याभ्यां भूतानि प्रस्फुरन्ति हि । यथा तमःप्रकाशाभ्यामहोरात्रा महीतले ॥ १०१ ॥ चिदूपजडरूपाभ्यामारव्धेयं जगत्स्थितिः । जलामृताभ्यां मिश्राभ्यां शीता तनुरिवैन्दवी ॥ १०२ ॥

हिन्दी अर्थ

तम और प्रकाश की जो सन्धि है, वह तो उभयविलोपात्मक एक शून्यरूप ही है, अतः उसमें उन दोनों से विलक्षण तीसरा कोई रूप नहीं रहता, ऐसी आशंका करके कहते हैँ । तम ओर प्रकाश इन दोनों की सन्धि भी अशून्यस्वरूप ही है, क्योकि वह सन्धि इन दोनों का ही परस्पर संलग्नस्वरूप है । यह बात समझ लेने की हे कि शून्य वस्तुओं की सन्धि नहीं होती ओर न सद्रूप वस्तुओं में निमित्तरहित शून्यता ही रहती हे । वे दोनों सन्धि में वर्तमान कैसे हैं, यदि ऐसी आशंका हो, तो उसका (८) "सोमं सुखागमे” इस पाठ में तो - अग्निस्वरूप यजमानरूपी प्राण यज्ञ मेँ अमृत के तुल्य शीतल सोमरस का पान करके अन्त मेँ धूमादिमार्ग से स्वर्ग पहुँचने में चन्द्रमा के समीप आकाशरूपी मार्ग की सन्धि मिल जाने से चन्द्रमा को प्राप्त करके चन्द्रस्वरूप बन जाता है ओर कलाओं से अपना शरीर भर लेता है, वही इसका पूर्णिमा के दिन पुनः स्थूल बना हुआ सोमपरिणाम है, यह अर्थ है । उत्तर यह हे । जैसे भाव और अभावरूप से निरूपित तम और प्रकाश (~) के दो दो स्वरूप एक वस्तुरूप होने से एक स्थान में वर्तमान हैं वैसे ही वे दोनों सन्धि में भी वर्तमान हैं, अणुमात्र भी अन्यथाभूत नहीं है; यह भाव है । जेसे पृथिवी पर तम ओर प्रकाश से रात और दिन हो रहे हँ वैसे ही चेतनता ओर जडता इन दोनों से संसार के जीव स्फुरित हो रहे हैँ । जैसे मिश्रित जल और अमृत से चन्द्रमा की शीतल देह निर्मित है वैसे ही चिद्रूप ओर जडरूप से यह जगत्‌ की स्थिति निर्मित हे