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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 97–99

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 97–99 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 97-99

संस्कृत श्लोक

अग्नेर्विनाशे सद्रूपपरिणामो निशाकरः । इन्दोर्विनाशे सद्रूपपरिणामो हुताशनः ॥ ९७ ॥ हुताशो नाशमागत्य सोमो भवति वै तथा । दिवसो नाशमागत्य रात्रिर्भवति वै यथा ॥ ९८ ॥ तमःप्रकाशयोश्छायातपयोर्दिनरात्रयोः । मध्ये विलक्षणं रूपं प्राज्ञैरपि न लभ्यते ॥ ९९ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वत्र अग्नि ओर चन्द्रस्वरूप परिणाम में उभयरूप संकीर्णता भी सूक्ष्म दृष्टि से अच्छी तरह देखी जा सकती है, इस अभिप्राय से कहते हैं । ओर अग्नि के विनाश में सद्रूप परिणाम चन्द्रमा है तथा चन्द्रमा के विनाश में सद्रूप परिणाम अग्नि है । जैसे दिन नाश को प्राप्त होकर रात हो जाता हे वैसे ही अग्नि नाश को प्राप्त होकर चन्द्र हो जाता है । तम (अंधकार) ओर प्रकाश, छाया ओर धूप तथा दिन और रात के बीच में विलक्षण सद्रूप ब्रह्म बड़े-बड़े बुद्धिमानों को भी प्राप्त नहीं होता