Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 106
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verse 106 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 106
संस्कृत श्लोक
सोमं प्रकटयत्यग्निश्चिद्देहस्य चिरं प्रभाम् ।
स्वसंविन्मयमिन्दुश्चिद्देहस्थं रूपमर्कजम् ॥ १०६ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्त और दाष्टन्ति दोनों मे युक्ति ओर फल बतलाते हैं।
चन्द्रमण्डल में प्रविष्ट हुई सूर्यप्रभारूप अग्नि जलमय चन्द्रबिम्ब को प्रकाशमय कर देती है और
देह में जीवभाव से प्रविष्ट हुई चिति जीवनपर्यन्त देह को अहम्भावादिरूप से प्रकाशित करती हे,
यों एक दूसरे का सम्मेलन होने पर तादात्म्यअध्यास से सूर्यमण्डल-जनित प्रभामण्डलात्मकरूप
चन्द्रस्वरूप हो जाता है ओर चिति अपने संवित्स्वरूप "अहं मनुष्यः अहं चेतनः' इत्यादि अनुभव के
अनुसार देहस्वरूप हो जाती हे