Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 107–109
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 107–109 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 107-109
संस्कृत श्लोक
चिन्निष्क्रिया त्वनामा सा केवला नोपलभ्यते ।
आलोक इव दीपेन देहेनैवावगम्यते ॥ १०७ ॥
चितश्चेत्योन्मुखत्वेन लाभः सैव च संसृतिः ।
निश्चेत्यायाः शुभो लाभो निर्वाणं वा तदेव हि ॥ १०८ ॥
अन्योन्यलब्धसद्वाक्यावेवं कुड्यप्रकाशवत् ।
अग्नीषोमाविमौ ज्ञेयो संपृक्तौ देहदेहिनौ ॥ १०९ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे भी चिति को देहधर्मो का भ्रम हो जाता है, यह कहते हैं।
क्रिया और उपाधि से शून्य वह केवल चिति उपलब्ध नहीं होती । जैसे दीप द्वारा प्रकाश का भान
होता है वैसे ही देह द्वारा ही चितिका भान होता है । अज्ञान से आवृत्त चिति को विषयों की ओर उन्मुख
होने से अनर्थप्राप्ति होती है, वही अनर्थप्राप्ति संसृति (संसार) है तथा विषयशून्य चिति का जो स्वरूप
है वही शुभ, लाभ या मोक्ष हे । हे श्रीरामजी, उक्त रीति से यह आप को जान लेना चाहिए कि दीवार
ओर सूर्यप्रकाश की नाई परस्पर मिले हुए रहने के कारण सद्रूप से वाग्व्यवहार के विषय बने हुए देह
(७) अर्थात् परस्पर निरपेक्ष निरूपण करने से भावरूप तथा परस्पर सापेक्ष निरूपण करने से
अभावरूप तम एवं प्रकाश अभावस्वरूप एक ही वस्तु है ओर इसी तरह प्रकाश एवं अन्धकारअभाव
भी एक वस्तु है ।
ओर देही (चिति) ये दोनों अग्नि और चन्द्रस्वरूप हैं