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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 43–47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 43–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 43-47

संस्कृत श्लोक

आधिव्याध्योरिति प्रोक्तौ नाशोत्पत्तिक्रमौ त्वयि । कुण्डलिन्याः कथायोगादधुना प्रकृतं शृणु ॥ ४३ ॥ पुर्यष्टकपराख्यस्य जीवस्य प्राणनामिकाम् । विद्धि कुण्डलिनीमन्तरामोदस्येव मञ्जरीम् ॥ ४४ ॥ तां यदा पूरकाभ्यासादापूर्य स्थीयते समम् । तदैति मैरवं स्थैर्यं कायस्यापीनता तथा ॥ ४५ ॥ यदा पूरकपूर्णान्तरायतप्राणमारुतम् । नीयते संविदेवोर्ध्वं सोढुं घर्मक्लमं श्रमम् ॥ ४६ ॥ सर्पीव त्वरितैवोर्ध्वं याति दण्डोपमां गता । नाडीः सर्वाः समादाय देहबद्धा लतोपमाः ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रासंगिक प्रश्न का उत्तर देकर अब जो प्रकृत सिद्धि मे हेतु है, उसका निरूपण आरम्भ करते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, कुण्डलिनी के कथा प्रसंग से आधि ओर व्याधि के नाश तथा उत्पत्ति के क्रम का वर्णन मैंने आपसे इस तरह कर दिया, अब आप प्रकृत प्रसंग सुनिये । हे राघव, पुर्यष्टकनामक लिंगात्मक जीव की आधारभूत कुण्डलिनी को आप सुगन्ध की आधारभूत पुष्पमंजरी की नाई जानिये । पूरक के अभ्यास से जब प्राणी कुण्डलिनी को भर करके यानी कूर्माकार नाड़ी मे प्राणवायु को रोक करके समरूप से स्थित होता है तब मेरुपर्वत के समान स्थिरता अर्थात्‌ भेरवी सिद्धि तथा काय की गुरुता (गरिमा नामक सिद्धि) उसे प्राप्त होती है । जिस समय पूरक से पूर्ण शरीर के भीतर मूलाधार से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त लम्बा करके प्राणवायु को ऊपर खींचकर प्राणवायु के निरोध से उत्पन्न गरमी ओर तत्प्रयुक्त शारीरिक ओर मानसिक कष्ट सहन करने के लिए संवित्‌ (कुण्डलिनी) ऊपर की ओर पर्हुचाई जाती है, उस समय प्राणवायु को ऊपर खींचने से ङण्डे की नाँई लम्बी होकर वह कुण्डलिनी देह में वैधी हुई, लता के समान सब नाडियों को अपने साथ लेकर अधिक अभ्यास होने के कारण साँपिन की तरह शीघ्र ऊपर चली जाती है