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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 40–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 40–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 40-42

संस्कृत श्लोक

शुद्धया पुण्यया साधो क्रियया साधुसेवया । मनः प्रयाति नैर्मल्यं निकषेणेव काञ्चनम् ॥ ४० ॥ आनन्दो वर्धते देहे शुद्धे चेतसि राघव । पूर्णेन्दावुदिते ह्यत्र नैर्मल्यं भुवने यथा ॥ ४१ ॥ सत्त्वशुद्ध्या वहन्त्येते क्रमेण प्राणवायवः । जरयन्ति तथान्नानि व्याधिस्तेन विनश्यति ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

आधियों के उपशम का उपाय बतलाते हैं। हे साधो, शुद्ध और पवित्र साधुसेवनरूप क्रिया से मन ऐसे निर्मलता को प्राप्त होता है, जैसे कसौटी से सुवर्ण । हे राघव, चित्त के शुद्ध हो जाने पर शरीर में आनन्द ऐसे बढ़ता है, जैसे पूर्णचन्द्रमा के उदित होने पर इस भुवन मेँ निर्मलता। सत्व की (अन्तःकरण की) शुद्धि से ये प्राणवायु अपने क्रम से बहते हैं और अन्न का परिपाक करते हैं, इससे सब व्याधिर्यो नष्ट हो जाती हैँ