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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 30–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 30–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 30-39

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । चित्ते विधुरिते देहः संक्षोभमनुयात्यलम् । तथाहि रुषितो जन्तुरग्रमेव न पश्यति ॥ ३० ॥ अनवेक्ष्य पुरो मार्गममार्गमनुधावति । प्रकृतं मार्गमुत्सृज्य शरार्तो हरिणो यथा ॥ ३१ ॥ संक्षोभात्साम्यमुत्सृज्य वहन्ति प्राणवायवः । देहे गजप्रविष्टेन पयांसीव सरित्तटे ॥ ३२ ॥ असमं वहति प्राणे नाड्यो यान्ति विसंस्थितिम् । असम्यक्संस्थिते भूपे यथा वर्णाश्रमक्रमाः ॥ ३३ ॥ काश्चिन्नाड्यः प्रपूर्णत्वं यान्ति काश्चिच्च रिक्तताम् । प्राणाऽऽविधुरिते देहे सर्वतः सरितो यथा ॥ ३४ ॥ कुजीर्णत्वमजीर्णत्वमतिजीर्णत्वमेव वा । दोषायैव प्रयात्यन्नं प्राणसंचारदुष्क्रमात् ॥ ३५ ॥ यथा काष्ठानि नयति प्राचीदेशं सरिद्रयः । तथान्नानि नयत्यन्तः प्राणवातः स्वमाश्रयम् ॥ ३६ ॥ यान्यन्नानि निरोधेन तिष्ठन्त्यन्तःशरीरके । तान्येव व्याधितां यान्ति परिणामस्वभावतः ॥ ३७ ॥ एवमाधेर्भवेद्व्याधिस्तस्याभावाच्च नश्यति । यथा मन्त्रैर्विनश्यन्ति व्याधयस्तत्क्रमं शृणु ॥ ३८ ॥ यथा विरेकं कुर्वन्ति हरीतक्यः स्वभावतः । भावनावशतः कायं तथा यरलवादयः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

आधि से व्याधि कैसे उत्पन्न होती है ? पहले यही बतलाते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, मानसिक पीड़ाओं से चित्त के व्याकुल हो जाने पर शरीर अत्यधिक क्षुब्ध हो जाता है, इसीलिए क्रोधी जन्तु अपने आगे का प्रशस्त मार्ग नहीं देख पाता । सम्मुख मार्ग को न देखकर कुमार्ग की ओर उस तरह दौड़ता है जिस तरह बाण से घायल हुआ हरिण अपने प्रकृत मार्ग को छोड़कर अन्य मार्ग की ओर दौड़ता है। मानसिक पीड़ाओं से संक्षुब्ध हुए प्राणवायु अपनी समता को छोड़कर शरीर में विरुद्ध मार्ग में ऐसे बहते हैं जैसे हाथी के प्रवेश से क्षुब्ध हुए जल नदी के तट में विरुद्ध मार्ग में बहते हैं प्राणवायु के विषम बहने पर कफ, पित्त आदि के भर जाने से विषम स्थान में नाड़ियाँ ऐसे पहुँच जाती है जैसे राजा के अव्यवस्थित हो जाने पर वर्णाश्रम की मर्यादा विषम स्थान में पहुँच जाती है। प्राणवायु की विषमता द्वारा शरीर के विह्नल कर दिये जाने पर नदी के स्रोत की नाई कोई नाड़ियाँ तो अत्यधिक पूर्ण हो जाती हैं और कोई बिलकुल खाली पड़ जाती हैँ । प्राणवायु के संचार का क्रम बिगड़ जाने से भोजन किया गया अन्न कुजीर्णता, अजीर्णता या अतिजीर्णतारूप दोष को ही प्राप्त होता है । समाननामक प्राणवायु भुक्त अन्नो को रस बनाकर सम्पूर्ण शरीर में अपनी अपनी जगह में ठीक तरह से ऐसे पहुँचा देता है जैसे नदी का वेग पूर्वदिशा में काष्ठ को पहुँचा देता है। निरोध से जो अन्न शरीर के भीतर स्थित रहते हैं वे ही व्याधिरूप में परिणत हो जाते हैं, क्योकि धातु की विषमतारूप परिणाम कर देना उनका स्वभाव है। इस तरह आधि से व्याधि उत्पन्न होती है और आधि के अभाव से व्याधि भी नष्ट हो जाती है। और हे श्रीरामचन्द्रजी, जिस प्रकार मन्त्रों से व्याधियाँ विनष्ट होती हैं वह भी क्रम आप सुन लीजिये । जिस तरह हर (हरड़) के फल स्वभावतः विरेचनरूप कार्य करते हैं यानी दस्त पैदा करते हैं उसी तरह वायु, अग्नि, पृथिवी, जल आदि के बीजरूप य र ल व आदि मन्त्रों के वर्ण भी मान्त्रिक भावना के वश से नाड़ियों में रोगाकार परिणत अन्नरसों का उत्सारण, पाचन आदि कार्य करते हैं