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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । वद स्वभावस्य कथं ब्रह्मन्नचलसंस्थितिः । वक्तारः सानुकम्पा हि दुष्प्रश्नेऽपि न खेदिनः ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

केवलोऽथ विशेषोऽयं सिद्धप्राप्तौ स्थिरार्थता“ यह जो आपने कहा, उसमें स्वभाव ही कारण है, यह कहना चाहिए ओर आप ही पहले अनेक बार “घटस्य पटता दृष्टा“ इत्यादि श्लोको से यह भी कह चुके हैं कि मायामय होने के कारण सम्पूर्ण जगत्‌ की स्थिति अनियत है, तो फिर इस विषय में आप कृपाकर बतलाइये कि एकमात्र स्वभाव की स्थिति नियत कैसे है ? यह श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैँ । ब्रह्मन्‌, एक स्वभाव की चिरकाल तक अचल स्थिति कैसे रहती है, यह कृपाकर आप बतलाइ्ये, क्योंकि अपने शिष्यों के ऊपर दया रखनेवाले प्रवचनशील महात्मा लोग कठिन प्रश्न पूछने पर भी खेद नहीं करते