Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
शक्तिर्या तु स्वभावाख्या यथा स्फुरति चात्मनः ।
सर्गादिषु तथैवासौ स्थितिं यातीति निश्चयः ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्यसंकल्प परमेश्वर की सृष्टिकाल में संकल्यप्रयुक्त वस्तुस्वभाव की नियति भी सृष्टिकाल तक
ही नियत रहती है, फिर प्रलय होने पर वह नहीं रहती - इस तरह सम्पूर्ण पदार्थो के स्वभाव की नियति
के भंग में किसी तरह का विरोध नहीं है, इस आशय से अपने पूर्वोक्त का स्मरण दिलाते हुए महाराज
वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न का उत्तर देते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, सत्यसंकल्प परमात्मा की स्वभावनामक शक्ति जो सर्गादि में जिस तरह स्फुरित
होती हे उसी तरह वह सर्ग के प्रलय तक स्थित रहती हे, यह निश्चय है