Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 59–60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 59–60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 59,60
संस्कृत श्लोक
अवस्तुत्वादविद्याया वस्तुशक्तिरपि क्वचित् ।
भिद्यते दृश्यते ह्यङ्ग वसन्ते शारदं फलम् ॥ ५९ ॥
सर्वमेवमिदं ब्रह्म नानाऽनानातया स्थितम् ।
जृम्भते व्यवहारार्थं केवलं कथितस्थिति ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
काल और देश के भेद से भी वस्तुओ की शक्ति मेँ अनियतता (अनिश्वितता) देखी गयी है, इसे
कहते हैं।
हे रामजी, अविद्या के अवस्तुरूप होने से वस्तुओं की शक्ति भी कहीं-कहीं अर्थात् कामरूपदेश
आदि में भिन्न-भिन्न स्वरूप की होती है, वसन्त ऋतु में शरत्कालीन व्रीहि आदि फल भी दिखाई
देता है। नाना और अनानारूप अनियत स्वभाव से स्थित यह सब कुछ ब्रह्म ही है । तात्पर्य यह कि
ब्रह्मस्वभाव से ही यह सम्पूर्ण जगत् निश्चित एकरूपवाला है, न कि दूसरे स्वभाव से । प्राणियों के
कर्म और उनके फलोपभोग-व्यवहार के लिये केवल अज्ञात ब्रह्म ही कुछ काल तक नियत स्थिति
धारण करके विकसित होता है