Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 76
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verse 76 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 76
संस्कृत श्लोक
सर्वं तूष्णात्मकं किंचित्तेजोऽर्काग्न्यभिधं विदुः ।
शीतात्मकं तु सोमाख्यमाभ्यामेव कृतं जगत् ॥ ७६ ॥
हिन्दी अर्थ
शरीर के बाहर भी संसार में प्रकाश और गर्मी से तथा शीतता ओर जडता से अग्नि और चन्द्र का
ज्ञान करना चाहिए, यह कहते हैँ ।
बाहर यह जो सब कुछ उष्णस्वरूप दिखाई देता है इसे तेज, सूर्य या अग्नि नाम से विद्वान लोग
जानते हैं तथा जो कुछ शीतात्मक वस्तु दिखाई देती है उसे चन्द्र नाम से । इन्हीं दोनों से यह संसार
बनाया गया हे