Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 82
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verse 82 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 82
संस्कृत श्लोक
तुल्यकालोपलम्भासावित्थं छायातपस्थितिः ।
केवलैकोपलम्भाढ्या स्थितिर्दिवसरात्रिवत् ॥ ८२ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्त भेद के उपन्यास का यानी भिन्न-भिन्न दृष्टान्त देने का दूसरा तात्पर्य बतलाते हैं।
एक ही समय में इन दोनों की उपलब्धि यदि हो जाय तो इन दोनों की स्थिति छाया और धूप
के समान समझनी चाहिए और यदि केवल एक की ही उपलब्धि हो जाय तो रात और दिन के समान
इनकी स्थिति समझनी चाहिए