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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 88

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verse 88 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 88

संस्कृत श्लोक

अनास्था नास्ति कर्तृत्वमित्याद्याऽऽयुक्तिवादिनः । अवज्ञया बहिष्कार्याः स्वानुभूत्यपलापिनः ॥ ८८ ॥

हिन्दी अर्थ

जो वस्तु कार्य का सम्पादन करती हुई दिखाई पड़ती है, उसे ही कारण कहते हैं और कारण में कार्यकर्तृत्व कार्याभिनिवेशरूप आस्था के रहते ही देखा जाता है। केवल प्रकाशन कर उपक्षीण हुए दिन (00) यद्यपि अनुमानादि का भी संभव है तथापि प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध पदार्थों में उनकी खोज नहीं की जाती | इस विषय में, न्यायवाचस्पत्य में कहा है - “न हि करिणि दृष्टे चीत्कारेण तमनुमिमते मिमातारः” (अनुमान करनेवाले विद्वान्‌ लोग अपनी आँखों से हाथी देख लेने पर उसके चीत्कार से उसका अनुमान नहीं करते कि यह हाथी है), क्योकि प्रत्यक्षादि प्रमाण द्वारा पदार्थों की सिद्धि हो जाने से वहाँ पक्षतारूप कारण का अभाव रहता है, यह तात्पर्य है । में रात के निर्माण के लिए आस्था नहीं है, इस लिए दिन में रात्रि-निर्माणकर्तृत्व सिद्ध नहीं होता, ऐसे ही रात में भी दिननिर्माणकर्तृत्व सिद्ध नहीं होता-इस रीति से अचेतन मिट्टी आदि में भी घटादि के निर्माण करने की आस्था नहीं रह सकती, क्यो कि वह आस्था तो चेतन का धर्म है। किंतु, पैरों से खूब नहीं रदे गये मिट्टी के पिंड से घट की निष्पत्ति कभी नहीं होती पैरों से रोदनेपर तो मिट्ठी का पिंड नष्ट ही हो जाता है, इसलिए कौन वस्तु सद्रूप से परिणत होगी । यह तो आप कह नहीं सकते कि उस मिट्ठी के पिण्ड और घट से अलग एक तीसरी ही दोनों में अनुगत मिट्टी नाम की चीज है। किंतु, यदि आप यह कहें कि बीज तो अंकुर पैदा करेगा ही चाहे वह भले ही किसी एक जगह रख दिया गया हो, नष्ट होना चाहता हो, नष्ट हो रहा हो या बिलकुल नष्ट ही हो गया हो; तो इसमें आपका प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योकि आपके मत से कोठार में रखा हुआ बीज भी अंकुर पैदा करने लगेगा। दूसरा और तीसरा भी नहीं बनता, क्योंकि जो स्वयं अपनी रक्षा करने में समर्थ नहीं है, वह दूसरा बच्चा पैदा करेगा-यह आपकी कौन-सी युक्ति है ? अब रह गया एक चौथा पक्ष, वह तो संसार में सबके अनुभव से बाधित है; इसलिए यह सिद्ध है कि किसीसे किसीकी उत्पत्ति या विनाश नहीं होता, किन्तु स्वभावतः सब पदार्थ उत्पन्न और विनष्ट होते रहते हैं । इसमें पूर्वापर का अवलोकन करने से अविवेकियों को ही कार्यकारणभाव के विषयमे विकल्प होते हैं, विवेकियों को नहीं, अतः दुर्युक्तिपूर्वक बोलनेवालों को स्वानुभव विरोध के उद्भावन से ही विद्रत्समाज से निकालकर बाहर कर देना चाहिए, यह कहते हैं। चूँकि आस्था नहीं है, इसलिए कर्तृत्व भी नहीं है, इत्यादि दुर्युक्तिपूर्वक बोलनेवालों को, जो स्वयं अपने अनुभव का अपलाप करते हैं, तिरस्कार के साथ यानी कान पकड़कर विद्वानों की भरी सभा से बाहर कर देना चाहिए, क्योकि उनके मत में भी अनास्थादियुक्तिबुद्धि अकर्तृत्वादिबुद्धि उत्पन्न करती है, यह कार्यकारणभाव अन्त में निकल ही जाता है