Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 82, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
आत्मन्येवात्मभावेन सर्वव्यापि निरञ्जनम् ।
चिन्मात्रममलोऽस्मीति ज्ञानादित्येन नश्यति ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब किस सूर्य से उसका नाश होता है, उसे कहते है ।
आत्मा में ही आत्मभावना से "सर्वव्यापक, निरंजन और निर्मल चिन्मात्र मे ही हूँ" इस ज्ञानरूपी
सूर्य से ही नष्ट होता है