Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, Verses 24–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 82, verses 24–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 24-27
संस्कृत श्लोक
अन्ये च विदितात्मानो भावयन्ति यथैव यत् ।
तत्तथैवाशु पश्यन्ति दृढभावनया तया ॥ २४ ॥
दृढभावानुसंधानाद्विमूढा अपि राघव ।
विषं नयन्त्यमृतताममृतं विषतामपि ॥ २५ ॥
एवं यथा यदेवेह भाव्यते दृढभावनात् ।
भूयते हि तदेवाशु तदित्यालोकितं मुहुः ॥ २६ ॥
सत्यभावनदृष्टोऽयं देहो देहो भवत्यलम् ।
दृष्टस्त्वसत्यभावेन व्योमतां याति देहकः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस ज्ञानसिद्धि के दृढ़ हो जाने पर भी जीवन्मुक्त महात्माओं को ऐच्छिक विनोद के लिए स्थूल
सूक्ष्म प्रातिभासिक देह की कल्पना सिद्ध होती है, यह कहते हैं।
अन्य तत्त्वज्ञानी महात्मा लोग जिस पदार्थ की जिस रीति से भावना करते हैं, वे उस पदार्थ को
उसी रीति से शीघ्र अपनी उस दृढ़ भावना के बल से देख लेते हैँ । हे राघव, दृढ़ भावना के अनुसन्धान
से विमूढ (विषकीट आदि) प्राणी भी विष को अमृत के समान आहाररूप में पहुँचा देते हैं और अमृत को
भी यानी अमृत के समान दुग्ध, अन्न आदि को भी “इन में विष मिला हुआ है” इस दृढ़ भावना से विष
बना डालते हैं। तात्पर्य यह है कि विष को अमृत समझकर पी जाते हैं और अमृत को भी विष समझकर
छोड़ देते हैं। इस तरह दृढ़ भावना से जिस प्राणी के द्वारा जिस पदार्थ की जिस रीति से भावना की जाती
है, शीघ्र वह प्राणी उसी रीति से वही बन जाता है। हे श्रीरामचन्द्रजी, इसके अनेक उदाहरण इस संसार
में देखे गये हैं। सत्य की भावना से देखा गया यह शरीर ठीक शरीर हो जाता है असत्य की भावना से
जाती है ओर जो कलन के उपरान्त होती है । सुश्रुत के अनुसार जब ऋतुमती स्त्री का स्वप्न मैथुन
द्वारा रज उसके गर्भाशय में प्रवेश करता है, तब भी उससे हड्डी आदि से रहित एक बुलबुला-सा
बनकर रह जाता है, वह भी कलल कहलाता है ।
देखा गया यही शरीर ब्रह्माकाशता को प्राप्त हो जाता हे