Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, Verses 29–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 82, verses 29–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 29-34
संस्कृत श्लोक
रेचकाभ्यासयोगेन जीवः कुण्डलिनीगृहात् ।
उद्धृत्य योज्यते यावदामोदः पवनादिव ॥ २९ ॥
त्यज्यते विरतस्पन्दो देहोऽयं काष्ठलोष्टवत् ।
देहेऽपि जीवेऽपि मतावासेचक इवादरः ॥ ३० ॥
स्थावरे जंगमे वापि यथाभिमतयेच्छया ।
भोक्तुं तत्संपदं सम्यग्जीवोऽन्तर्विनिवेश्यते ॥ ३१ ॥
इति सिद्धिश्रियं भुक्त्वा स्थितं चेत्तद्वपुः पुनः ।
प्रविश्यते स्वमन्यद्वा यद्यत्तात विरोचते ॥ ३२ ॥
देहादयस्तथा बिम्बान्व्याप्तवत्याखिलानथ ।
संविदा जगदापूर्य संपूर्ण स्थीयतेऽथवा ॥ ३३ ॥
ज्ञात्वा सदाभ्युदितमुज्झितदोषमीशो यद्यद्यथा समभिवाञ्छति चित्प्रकाशः ।
प्राप्नोति तत्तदचिरेण तथैव राम सम्यक्पदं विदुरनावरणत्वमेव ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वप्रथम पूर्व देह के परित्याग में उपाय बतलाते हैं।
जिस तरह पवन से पुष्प में से मोद (सुगन्ध) खींचकर प्राणेन्द्रिय में सम्बद्ध किया जाता है उस
तरह रेचक के अभ्यासरूप योग से कुण्डलिनीरूप घर से बाहर निकालकर ज्यों ही दूसरे शरीर में जीव
सम्बद्ध किया जाता है, त्यों ही यह शरीर परित्यक्त हो जाता है, जीवरहित यह देह अनेकविध चेष्टाओं
से निवृत्त होकर काठ और मिट्टी के ठेले के सदृश जड़ हो जाती है। जैसे सिंचन करनेवाला पुरुष अपने
हाथ में लिये हुए जलपूर्णं कुम्भ से जिस वृक्ष और लता को सींचने की इच्छा करता है उसे ही सींचता हे,
वैसे ही अपनी रुचि के अनुसार देह, जीव, बुद्धि, स्थावर ओर जंगम सबमें भी उनकी सम्पत्ति का भोग
करने के लिए अपना जीव प्रवेशित किया जाता है और उनमें आदर करता है । उक्त प्रणाली से पर देह
में सिद्धि श्री का उपभोगकर अवस्थित हुआ योगी यदि अपना पहला शरीर विद्यमान रहा तो उसमें
प्रविष्ट हो जाता है ओर यदि न रहा तो दूसरे शरीर मे जब तक उसकी रूचि रहती है, तबतक उसमें
प्रविष्ट होकर स्थित रहता हे । अथवा यह भी एक बात हो सकती है - परदेह में उपभोग के बाद योगी
अपने अन्तःकरण में विपुलता सम्पादन द्वारा समस्त जगत् को व्याप्त कर स्थावर-जंगम समस्त देह
आदि प्रतिविम्बोपाधि, उन स्थावर आदि उपाधिया में पड़े हुए प्रतिविम्बभूत जीव, विम्बभूत चैतन्य की
उपाधिरूप सत्त्व आदि गुण एवं सत्त्वादि गुणों से युक्त चैतन्यरूप बिम्ब - इन सभीको व्याप्त करनेवाली
अपनी आत्मसंवित्ति से पूर्णात्मना होकर स्थित रहता हे । रामभद्र, योगरूप एश्वर्य से संपन्न जीवात्मारूप
चित्प्रकाश सदा उदित सनातन स्वप्रकाशस्वरूप सर्वविध दोषशून्य आत्मतत्त्व को जानकर जो भी कुछ
जैसा चाहता है वह वैसा ही उसे तत्काल प्राप्त कर लेता है, इसलिए तत्त्वज्ञ लोग छोटी-छोटी सिद्धियों
को अधिक महत्त्व नहीं देते, किन्तु अनावरणतारूप निरतिशयानन्द उत्तम पद को ही महत्त्व देते हैं, यों
अनुभवी लोग कहते है