Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 111–113
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 85, verses 111–113 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 111-113
संस्कृत श्लोक
क्षुधादिना पदार्थेन दुःखं केनचिदेव हि ।
तमो मेघपटेनेव स्वभावो ह्यत्र कारणम् ॥ १११ ॥
स्वरूपे निर्मले सत्ये निमेषमपि विस्मृते ।
दृश्यमुल्लासमाप्नोति प्रावृषीव पयोधरः ॥ ११२ ॥
अनारतानुसंधानादप्युन्मेषमविस्मृते ।
स्वरूपे नोल्लसत्येष चित्ते दृश्यपिशाचकः ॥ ११३ ॥
हिन्दी अर्थ
युख-दुःखरूपता ही दृष्टान्त से बतलाते है ।
राजन्, तृप्ति आदि के साधन किसी पदार्थ से सुख उस प्रकार बढ़ता हे, जिस प्रकार दीपक
से प्रकाश और चन्द्रमा से महासागर । क्षुधा आदि किसी पदार्थ से दुःख उस प्रकार बढ़ता है, जिस
प्रकार मेघरूपी पट से रात में अन्धकार बढ़ता हे, इन सब विषयों में केवल स्वभाव ही एकमात्र कारण
है ॥१०९.११०॥
जब ज्ञानियों को भी क्षणभर आत्मविस्मृति होने पर ऐसी अनर्थपरम्परा आती है तव अज्ञानियो की
तो बात ही क्या है, इस आशय से कहते हैं।
एक निमेष मात्र के लिए भी सत्य निर्मल स्वरूप यदि विस्मृत हो जाय, तो वर्षाकाल में मेच के सदृश
यह दृश्यरूप अनर्थ उल्लसित हो उठता है । निरन्तर आत्मतत्त्व का अनुसन्धान करने से जब उन्मेषमात्र
भी आत्मतत्त्वस्वरूप विस्मृत नहीं होता, तब यह दुश्यरूपी पिशाच चित्त मे उल्लसित नहीं होता। निष्कर्ष
यह निकला कि किसी समय भी दृश्य उल्लसित न हो जाय, इसलिए निरन्तर ही समाधि से अपने स्वरूप
का स्मरण करते रहना ही चाहिए । जैसे अन्धकार ओर प्रकाश के कारण दिन ओर रात अपनी-अपनी
स्थिति प्राप्त किये हुए हँ वैसे ही सुख ओर दुःख से यह शरीर अपनी स्थिति किये हुए हँ