Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 114–115
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 85, verses 114–115 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 114,115
संस्कृत श्लोक
यथा तमःप्रकाशाभ्यामहोरात्रौ स्थितिं गतौ ।
तथैव सुखदुःखाभ्यां शरीरं स्थितिमागतम् ॥ ११४ ॥
एवं हि सुखदुःखे द्वे जन्मकारणदर्शनात् ।
अक्षस्य गाढतां याते पटे कुङ्कुमवद्दृढम् ॥ ११५ ॥
हिन्दी अर्थ
यों ज्ञानी ओर अज्ञानी दोनो में प्रारब्ध फलभोग एक-सा होने पर भी राग-अरागजनित विशेष है
ही, इसका दृष्टान्त द्वारा उपपादन करते हैं।
यों देह मेँ ही आत्मरूपता का अवलोकन करने के कारण सुख-दुःख दोनों अज्ञानीयों मे ऐसे
दृढ़रूपता को प्राप्त हो गये हैं; जैसे पट में केसर दुढरूपता को प्राप्त हो जाता है । हे प्रिय, आत्मतत्त्वज्ञान
के प्रभाव से तत्त्वज्ञानी में तनिक भी ये सुख-दुःख उस प्रकार नहीं लगते, जिस प्रकार स्फटिक मणि में
केसर आदि रंगों का सम्बन्ध होने पर भी केसर आदि रंग नहीं लगते