Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verse 116
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 85, verse 116 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 116
संस्कृत श्लोक
तज्ज्ञस्य त्वङ्ग लगतो मनागपि न तद्वशात् ।
यथा शुभाशुभौ रागादिनाक्रान्ततरौ मणेः ॥ ११६ ॥
हिन्दी अर्थ
अब स्फटिक की अपेक्षा भी ज्ञानी में अधिक स्वच्छता होने से विशेष बतलाते हैं ।
राजन्, जैसे समीप में विद्यमान जपाकुसुम आदि रंजक द्रव्यों के कारण स्फटिक मणि लालिमा
आदि कुछ काल के लिए धारण करता है, वैसे आत्मतत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त मुनि बोध के प्रभाव से समीप में
पदार्थों के रहने पर भी उनसे सुख-दुःख आदिका सम्बन्ध प्राप्त नहीं करता