Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 117–121
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 85, verses 117–121 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 117-121
संस्कृत श्लोक
पुरःस्थवस्तुभावेन रञ्जनां स्फटिको यथा ।
तज्ज्ञस्तथा नैति बोधाज्जीवन्मुक्तमतिर्मुनिः ॥ ११७ ॥
वस्तुनः श्लेषमात्रेण घनरञ्जितमेति धीः ।
गतेऽपि वस्तुनि दृढं बुद्धिर्यत्परितापिता ॥ ११८ ॥
गतेऽपि कुङ्कुमे वस्त्रं तदीयमनुरञ्जनम् ।
न जहाति यथा मूढस्तथा विषयरञ्जनम् ॥ ११९ ॥
अनेनैव क्रमेणैतौ बन्धमोक्षौ व्यवस्थितौ ।
भावनातानवं मोक्षो बन्धो हि दृढभावना ॥ १२० ॥
शिखिध्वज उवाच ।
स्वोत्पत्तिकारणप्राप्तौ कथं दुःखं सुखं च वा ।
अभ्युदेतीति वद मे दूरस्थानामपि प्रभो ॥ १२१ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानियों को सुख-दुःख घनरूप से प्राप्त होते हैं, यह जो पहले कहा था उसका वर्णन करते हैं।
चूँकि अज्ञानियों की बुद्धि वस्तुओं के हट जाने पर भी अत्यन्त सन्तप्त रहती है, इसलिए वस्तुओं
के सम्बन्धमात्र से उनकी बुद्धि दृढ़ आसक्त हो जाती है, यह निश्चित ही हे । जैसे केसर का सम्बन्ध
विच्छिन्न हो जाने पर भी वस्त्र उसका रंग नहीं छोडता, वैसे ही वस्तुका सम्बन्ध विच्छिन्न हो जाने पर
भी विषयों का अनुराग अज्ञानी नहीं छोड़ता । हे राजन्, इसी क्रम से ये बन्ध और मोक्ष दोनों अवस्थित
हैं । विषयभावना का विनाश ही मोक्ष है और विषयों की दृढ़ भावना ही बन्ध है। राजा शिखिध्वज ने
कहा : हे प्रभो, दूरस्थ या समीपस्थ राज्य या पुत्र आदि के लाभ से सुख और उनके विनाश से दुःख
होता है। सुख और दुःख की उत्पत्ति में हेतुभूत इष्टप्राप्ति और इष्टविनाश रूप कारण का लाभ होने पर
उत्पन्न होनेवाले सुख और दुःख जीव में कैसे आ जाते हैं ? यह मुझसे कहिए | हे प्रभो, आपका वचन
अनेक अर्थों से परिपूर्ण, अत्यन्त उदार और अतिस्वच्छ (अतिस्पष्टार्थक) होता है, इसलिए घनगर्जन
में मयूर की नाईं आपके वचनों के श्रवण में तृष्ति ही नहीं होती