Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verse 143
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 85, verse 143 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 143
संस्कृत श्लोक
चलितं तत्त्वधो याति गर्जादिव घनादि खे ॥ १४३ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर मेद, अस्थि आदि के अन्दर संचरण करनेवाले व्यानवायु की प्रेरणा से
समस्त अंगों में विद्यमान मेदा का अन्तर्गत सारभूत सार मज्जासार उत्तम सौगन्ध्य के सदुश अनुगत
रजोभाग को (सूक्ष्म अंश को) तत्क्षण उस प्रकार छोड देता है, जिस प्रकार डंठल से तोडा गया पत्र, फल
आदि अपने अन्दर स्थित जलभाग को अन्दर के वायुस्पन्द से छोड़ देता है ॥ १४ २॥ वह छोड़ा गया रज
(सूक्ष्म अंश) सब अंगों से विचलित होकर नाडिय द्वारा नीचे मूलाधार स्थान तक ऐसे आता है, जैसे
आकाश में विद्यमान मेघ आदि पुरोवात से वर्षणोन्मुख होकर नीचे भूतल पर आते हैँ । फिर मूलाधार में
आने के वाद नाडी द्वारा स्वभावतः ही बाहर निकल जाता है