Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 86, Verses 13–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 86, verses 13–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 13-18
संस्कृत श्लोक
इन्दुं मास इवापूर्णं कालेन सुषुवे घटः ।
गर्भं कमलपत्राक्षं प्रसूनमिव माधवः ॥ १३ ॥
परिपूर्णसमस्ताङ्गः कुम्भाद्गर्भो विनिर्ययौ ।
इन्दुः सूक्ष्मादिवाम्भोधेरपरः क्षयवर्जितः ॥ १४ ॥
दिनैः कतिपयैरेव वृद्धिमभ्याजगाम सः ।
अप्रमेयाङ्गसौन्दर्यः शुक्लपक्षे शशी यथा ॥ १५ ॥
सर्वसंस्कारसंपन्ने स तस्मिन्नारदो मुनिः ।
भाण्डाद्भाण्ड इवाशेषं विद्याधनमयोऽजयत् ॥ १६ ॥
दिनैः कतिपयैरेव विज्ञाताशेषवाङ्मयम् ।
चकारैनं मुनिवरः प्रतिबिम्बमिवात्मनः ॥ १७ ॥
तेनाराजत पुत्रेण मुनिना मुनिनायकः ।
रत्नाद्रौ प्रतिबिम्बेन संध्योदित इवोडुराट् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
समय पाकर उस घटने कमलपत्र के सदृश नेत्रवाले गर्भ
का उस प्रकार प्रसव किया, जिस प्रकार पूर्णमास परिपूर्ण चन्द्रमा का ओर वसन्त कुसुमों का प्रसव
करती है । कुम्भ से वह गर्भ समस्त अंगों से परिपूर्ण होकर उस प्रकार निकला, जिस प्रकार
घटादिपरिच्छिन्न क्षीरसागर से क्षयवर्जित दूसरा चन्द्रमा | वह कुछ ही दिनों में शुक्लपक्ष में चन्द्रमा
की नाई बढ़ गया । उसके अंग प्रत्यंग में ऐसा सौन्दर्य निखर रहा था, जिसका निरूपण नहीं हो
सकता । जब उसके सभी जातकर्म आदि संस्कार हो चुके, तब उन नारदजी ने उस बालक में
विद्यारूपी धन उस प्रकार उछाल दिया, जिस प्रकार एक पात्र से दूसरे पात्र में धन । थोडे ही दिनों
में उसने यावत् विद्यास्थानं का भलीभाँति ज्ञान कर लिया। थोड़े में मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने उस बालक
को ठीक अपने प्रतिबिम्ब के समान बना डाला । पुत्ररूपी दूसरे मुनि के साथ मुनिनायक नारदजी उस
प्रकार सुशोभित होने लगे, जिस प्रकार स्फटिक पर्वत में पड़े हुए प्रतिबिम्ब के साथ सन्ध्याकाल के
पूर्णचन्द्र सुशोभित होते हों