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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

चूडालोवाच । पितामहमहं पूर्वं कदाचित्पृष्टवानिदम् । यत्क्रियाज्ञानयोरेकं श्रेयस्तद्ब्रूहि मे प्रभो ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

कर्मसमुच्वित उपासना से मुक्ति होती है, यह जो राजा को भ्रम हो गया है, वह जब तक निवृत्त नहीं किया जाता, तब तक आत्मा का उपदेश देने पर भी आत्मा जानेगा नहीं, इसलिए भरमनिवारणार्थ अपने को जिस क्रम का पितामह ने उपदेश दिया था, उसका श्रवण कराते है । चूडाला ने कहा : साधो, किसी समय पहले मैंने अपने पितामह ब्रह्माजी से यह प्रश्न किया था कि हे प्रभो, ज्ञान और कर्म-इन दोनों में जो भी कोई एक मुक्ति का कारण हो, उसे मुझसे कहिए