Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मोवाच ।
ज्ञानं हि परमं श्रेयः कैवल्यं तेन वेत्त्यलम् ।
कालातिवाहनायैव विनोदायोदिता क्रिया ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माजी ने कहा : हे पौत्र, ज्ञान ही परम श्रेय है यानी उत्तम आत्मतत्त्व का कारण हैँ । केवल उसीसे
भलीभाँति आत्मा का साक्षात् अनुभव हो जाता हे । श्रुतियों में जो क्रियाओं का उल्लेख किया गया हे,
वह तो कालयापनार्थ विनोदमात्र के लिए ही हे । तात्पर्य यह है कि स्वर्गादि सुखभोगरूप विनोद के लिए
यद्यपि क्रियाएँ प्रवृत्त होती हैं, तथापि परिणाम में स्वर्गभोग के विरस होने के कारण वह मुख्य पुरुषार्थ
नहीं हो सकता, अतः किन्हीं दूसरे प्रकार के भयंकर अनर्थो की उत्पत्ति के निवारणार्थं आयुष्यकालयापन
करने के लिए ही उक्त श्रुति मेँ क्रिया का उल्लेख किया गया है