Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अलब्धज्ञानदृष्टीनां क्रिया पुत्रपरायणम् ।
यस्य नास्त्यम्बरं पट्टं कम्बलं किं त्यजत्यसौ ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए विद्यां वा विद्यां च' इत्यादि श्रुति ज्ञान के अधिकारी जनों के लिए ही प्रवृत्त है । उस श्रुति
में अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते” यह जो मत्युतरण तथा अमृतत्व कहा गया है, उसका
अभिप्राय स्वाभाविक दुश्वेष्टानिवृत्ति मेँ तथा आपेक्षिक अमृतत्व में है, इस आशय कहते है ।
पौत्र भी पुत्ररूप होता है, इस अभिप्राय से ब्रह्माजी कहते हैँ ।
हे पुत्र कुम्भ, जिन जीवों को ज्ञानरूपा दृष्टि प्राप्त नहीं हुई है, उन लोगों के लिए क्रिया ही सबसे
बढ़-चढ़कर अवलम्बन हे । जिसके पास में पट्ट अम्बर (महर्घ पट्टू) नहीं रहता, क्या वह साधारण
कम्बल कहीं छोड सकता हे २