Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verses 2–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
अद्य तिष्ठाम्यहं साधो धन्यानां धुरि धर्मतः ।
अमृतस्यन्दिवचसा यत्त्वयास्मि समागतः ॥ २ ॥
न केचन तथा भावाश्चेतः शीतलयन्ति मे ।
राज्यलाभादयोऽप्येते यथा साधुसमागमः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
आपके उपदेश से मैं अवश्य कृतार्थ हो जाऊँगा, यह सूचित करने के लिए मैं कृतार्थ हो ही गया“
यों सिद्ध-सा मानकर कहते हैं।
हे साधो, चूँकि अमृत बहानेवाली वाणी बोलनेवाले आपके साथ मेरा समागम हुआ, इसलिए आज
तो मैं बड़े-बड़े धर्मानुष्ठान से धन्य हुए पुरुषों में सबसे प्रथम स्थान में अवस्थित हो गया हूँ। सज्जनों
का समागम अन्तरात्मा में जैसी शान्ति पहुँचाता है, वैसी शान्ति ये राज्य लाभ आदि बड़े-बड़े कोई भी
पदार्थ नहीं पहुँचाते