Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verses 4–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verses 4–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 4-7
संस्कृत श्लोक
निरर्गलरसो यत्र सामान्येन विजृम्भते ।
मुक्तरागादिमननं तत्कल्पनसुखावहम् ॥ ४ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवंवादिनि सैवास्य वाक्यमाक्षिप्य भूपतेः ।
भूयः प्रोवाच चूडाला मुनिदारकरूपिणी ॥ ५ ॥
चूडालोवाच ।
आस्तामेषा कथा तावत्सर्वं ते वर्णितं मया ।
त्वं मे कथय हे साधो कस्त्वमद्रौ करोषि किम् ॥ ६ ॥
कियत्पर्यवसानेयं भवतो वनवासिता ।
सत्यं कार्यं च नोऽसत्यं वक्तुं जानन्ति तापसाः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
राज्य-लाम आदि की अपेक्षा साधुसमागम में महत्त्व दिखलाते हैं ।
साधु पुरुषों का समागम होने पर तत्काल ही अपरिमित ब्रह्मानन्दरूप सुख-धनी, दरिद्र आदि
सबमें सर्वसाधारणरूप से - स्फुरित होने लग जाता है, वहाँ राग, द्वेष आदि का विचार ही नहीं रहता।
राज्यलाभ आदि तो तुच्छ सुख प्रदान करता है, यहाँ अपरिमित आनन्द की न संभावना है और न
सर्वसाधारण को सुलभ ही है। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, शिखिध्वज यों कह ही रहे थे कि
बीच में ही उस राजा के वाक्य को रोककर नारद मुनि के बच्चे के रूप में विद्यमान चूडाला बोलने लगी ।
चूडाला ने कहा : साधो, अब मेरी प्रशंसार्थ जो कुछ वचन आप कह रहे हैं, उसे रहने दीजिए। आपने जो
कुछ पूछा, उसका मैंने वर्णन किया । अब मुझसे कहिए कि आप हैं कौन और इस पर्वत पर क्या कर रहे
हैं ? आपका यह अरण्यवास कितने काल का हुआ यानी आपको अरण्यवास करते करते कितना समय
बीत गया। वनवास कर कौन कार्य सिद्ध करना चाहते हैं, यह सत्य सत्य कहिए, छिपाइए मत, क्योकि
तपस्वी लोग असत्य बोलना जानते ही नहीं