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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

न स्वभावेन फलति यथा शरलता फलम् । क्रिया निर्वासना पुत्र फलं फलति नो तथा ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

वासना से शून्य क्रिया क्यो फल पैदा नहीं करती ? इस प्रश्नपर काशलता के सदश स्वभाव से ही, यों उत्तर देते हैं। हे पुत्र, जैसे काश की लता स्वभाव से ही कोई फल नहीं देती, वैसे ही वासनाशून्य क्रिया स्वभाव से ही कोई फल नहीं देती