Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verses 22–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verses 22–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
सयक्षवासनो बालो यक्षं पश्यति नान्यथा ।
सदुःखवासनो मूढो दुःखं पश्यति नान्यथा ॥ २२ ॥
आकारभासुरात्युच्चैर्न ददाति फलं क्रिया ।
शुभाशुभा वा तज्ज्ञस्य फुल्ला शरलता यथा ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
युख-दुःख के भोग के लिए मैं योग्य हूँ, इस प्रकार की वासना ही, बालभ्रान्ति में हेतु यक्ष वासना के
सदश, तत्- तत् सुख आदि में कारण हैं, यों कहते हैं।
जब बालक यक्ष की वासना से युक्त रहता है, तभी यक्ष को देखता है, अन्यथा नहीं, बस इसी रीति
से जब पुरुष दुःख आदि की वासना से युक्त रहता है, तभी दुःख आदि का अनुभव करता है, अन्यथा
नहीं। उन्नत और आकार-प्रकार से धवल भले ही शुभाशुभ क्रिया हो, परन्तु आत्मज्ञानी को वह ऐसे
फल नहीं देती, जैसे विकसित धवल शरलता फल नहीं देती