Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
यस्य मौर्ख्यं क्षयं यातं सर्वं ब्रह्मेति भावनात् ।
नोदेति वासना तस्य प्राज्ञस्येवाम्बुधिर्मरौ ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले की वासना का नाश होने पर भी ज्ञान की उत्पत्ति के समय उत्पन्न हुई वासना तो क्रियारूप
फल का प्रसव करेगी ही, इस पर कहते हैं।
“सब कुछ ब्रह्मरूप ही है” इस भावना से जिसकी अज्ञानरूपिणी मूर्खता विनाश को प्राप्त हो गयी,
उसको वासना एसे उत्पन्न नहीं होती, जैसे मरुभूमि के स्वरूप को जाननेवाले प्राज्ञ पुरुष को मरुभूमि
में जलसागर की भ्रान्ति नहीं होती