Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
वासनामात्रसंत्यागाज्जरामरणवर्जितम् ।
पदं भवति जीवोऽन्तर्भूयो जन्मविवर्जितम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने अन्दर एकमात्र वासना का त्याग कर देने से ही जरा
ओर मरण से रहित तथा पुनर्जन्म से रहित परमार्थ वस्तुरूप जीव बन जाता है