Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
सवासनं मनो ज्ञेयं ज्ञानं निर्वासनं मनः ।
ज्ञानेन ज्ञेयमभ्येत्य पुनर्जीवो न जायते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
पितामह की उक्ति का उपसंहार करते हैं।
वासनायुक्त मन ज्ञेय है ओर वासनाशून्य मन ज्ञान है, यह जानना चाहिए । जब ज्ञान द्वारा
ज्ञातव्य ब्रह्म वस्तु प्राप्त हो जाती है, तब जीव दूसरी बार जन्मधारण नहीं करता