Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
कोऽहं कथमिदं जातं कथं शाम्यति चेति भोः ।
राजन्नावेक्षसे कस्मात्किमज्ञ इव तिष्ठसि ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि तपश्चर्या अनर्थ और हेय है, तो किसका अवलम्बन करना चाहिए, इस पर कहते हैं।
हे राजन्, मैं कौन हूँ, यह अनर्थात्मक जगत् किस तरह उत्पन्न हुआ, इसकी शान्ति किस उपाय से
होगी, इस तरह तो आप विचार नहीं करते और अज्ञानी की तरह क्यों रहते हैं ?