Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verses 31–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 31-33
संस्कृत श्लोक
कथं बन्धः कथं मोक्ष इति प्रश्रानुदाहरन् ।
पारावारविदां पादान्कस्माद्राजन्न सेवसे ॥ ३१ ॥
दुःस्पन्दसंविदा शैलकोटरे क्रिययानया ।
जीवितं क्षिपयन्किं त्वं शिलाकीटवदास्थितः ॥ ३२ ॥
साधूनां समदृष्टीनां परिप्रश्नेन सेवया ।
संगमेन च सा युक्तिर्लभ्यते मुच्यते यया ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
विचार के सदश गुरु के पास जाना, उनकी सेवा करना, उनसे आत्मा के विषय में प्रश्न करना
आदि भी उपादेय हैं, यह दिखलाते हैं।
यह संसार कैसे उत्पन्न हुआ, मोक्ष किस उपाय से होगा इत्यादि प्रश्न करते हुए आप पर तत्पदार्थ
और अपर त्वंपदार्थं को एकरूप से जाननेवाले तत्त्वज्ञ गुरुओं के पास जाकर उनके चरणों की सेवा क्यों
नहीं करते ? व्रत, उपवास, शीत, उष्ण आदि सुख-दुःखात्मक प्रवृत्ति में उत्सुक आत्मचैतन्य जिसमें
रहता है, ऐसी इस तपरूप क्रिया से पर्वतकोटर में, शास्त्र के कीट के सदृश, आप अपनी आयु क्यों
व्यतीत कर रहे हैं ? सम (ब्रह्म) दृष्टि साधु पुरुषों के पास आत्मकल्याणार्थ प्रश्न, उनकी सेवा तथा
समागम करने से वह युक्ति (आपकी अभीष्ट विश्रान्तिसुखदायिनी ज्ञानयुक्ति) प्राप्त हो जाती है,
जिससे तत्काल संसारबन्ध से पुरुष मुक्त हो जाता है