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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 88, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 88, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

न यदा येन लब्धव्यं न तत्प्राप्नोत्यसौ तदा । चिन्तामणिरवाप्तोऽपि दुर्धिया हेलयोज्झितः ॥ १६ ॥ इति तस्मिन्स्थिते यातो मणिरुड्डीय सिद्धयः । त्यजन्ति ह्यवमन्तारं शरो गुणमिवोज्झितः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

उसने क्यो नहीं यत्न किया, इस पर कहते है । जो वस्तु जिस समय जिसको प्राप्त होने योग्य नहीं रहती, वह वस्तु उस समय वह प्राप्त कर सकता ही नहीं । अतः प्राप्त हुआ भी चिन्तामणि दुर्बुद्धि के कारण उपेक्षा से उसने छोड दिया । उस प्रकार अज्ञानजनित विचारविमर्शं में जब वह पुरुष स्थित ही रहा तब अन्त में वह मणि उड़कर वहाँ से चला गया, क्योकि अवहेलना करनेवाले को सिद्धिर्यो उस प्रकार छोड देती हैं, जिस प्रकार धनुष से निर्मुक्त बाण डोरी को छोड देता है