Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 88, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 88, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
हत्वा प्राज्ञपदं पुंसः संयान्ति किल सिद्धयः ।
आगताः संप्रयच्छन्ति सर्वं यान्त्यसहत्यलम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
आपने तो कथा के आरम्भ में कहा था कि वह पुरुष व्यवहार मेँ निपुण था, फिर मणिप्राप्तिकाल में
उसकी वह निपुणता कहाँ वली गयी, इस पर कहते है ।
सिद्धियाँ प्राप्त होकर पुरुष को विचक्षणता देती हैं और उपेक्षा करनेवाले पुरुष के पास आकर भी
वापस चली जाती हैँ तथा वापस जाती हुई वे सिद्धियाँ पुरुष में रहनेवाली विचक्षणता का विनाश कर
डालती हैं, इस विषय में प्राचीन लोगों ने कहा है कि न देवा दण्डमादाय दण्डयन्त्यपराधिनम् । बुद्धिं
तस्यापकर्षन्ति तेनाऽसौ दण्ड्यते स्वतः ॥ (देवता दण्ड लेकर अपराधी पुरुष को दण्ड नहीं देते, किन्तु
उसकी बुद्धि हर लेते हैं, इससे स्वयं ही वह दण्डित हो जाता है ।)