Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 88, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 88, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
कलावानस्त्रकुशलो व्यवहारविचक्षणः ।
सर्वसंकल्पसीमान्तो न तु जानाति तत्पदम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
वह चौसठ कलाओं से पूर्ण था, अ्त्रविद्या में पटु था, व्यवहारशास्त्र में विचक्षण था
और संकल्पित समस्त कार्यो के पार हो जाता था यानी वह जिन- जिन कार्यो का संकल्प करता था,
उन्हें तत्काल ही कर डालता था । उसके लिए कोई भी असाध्य कार्य नहीं था । इतना सब होते हुए भी
वह परम पद को नहीं जानता था