Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 88, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 88, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
चूडालोवाच ।
अस्ति कश्चित्पुमान् श्रीमान् स्थानं नित्यविरुद्धयोः ।
गुणलक्ष्म्योरशेषेण यथाब्धिर्वाडवाम्बुनोः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
चूडाला ने कहा : कोई एक श्रीमान् पुरुष था । वह अनादि काल से ही एक दूसरे के स्थान में न
रहनेवाले अत्यन्त विरुद्ध गुण और लक्ष्मी का आश्रय था यानी उसके पास ओदार्य, वैराग्य, सर्वस्वत्याग
आदि उत्तम गुण ओर धनधान्यादि प्रचुर सम्पत्तियाँ थीं । संसार में गुण ओर सम्पत्ति दोनों का एक ही
स्थान विरल रहता है । जहाँ गुण रहता हे वहाँ सम्पत्ति नहीं रहती और जहाँ सम्पत्तियाँ रहती हैं वहाँ गुण
नहीं रहते। इसलिए वह वडवाग्नि ओर जल - इन परस्पर विरुद्ध दोनों के आश्रय सागर के सदृश प्रतीत
हो रहा था
सर्ग सन्दर्भ
सत्तासीवाँ सर्ग समाप्त अट्ञासीवाँ सर्ग चिरकाल की तपस्या से प्राप्त हुए चिन्तामणि को किसी ने अपनी मूर्खता से छोडकर मणि की भ्रान्ति से काँच को अपनाया, यह कथा |