Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
स्वचरितसदृशं तथोदयन्त्याश्चिरसमयेन विबोधनं च बुद्धेः ।
भवभयसुतरं महामतीनां श्रृणु कथयामि कथाक्रमं मनोज्ञम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
देहादि मे अभिमान का त्याग कराने के लिए तथा दुःखो का निदान दिखलाने के लिए मणि-काँच
के उपाख्यान तथा हस्तिपक के आख्यान का श्रवण कराने के लिए चूडाला अवतरण बाँधती है ।
राजन्, मैं एक ऐसा मनोहर कथाक्रम कहता हूँ, जो आपके चरित के सदृश है, मन्दमतियों की भी
चिरकाल के बाद विचारोदय द्वारा उदय को प्राप्त कर रही बुद्धि को बोध देनेवाला है तथा महामतियों को
तो शीघ्र ही संसार के भय से पार कर देनेवाला है, आप उसे सुनिये