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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

श्रवणानन्तरं बुद्ध्या शुभमित्येव भावयन् । श्रृणु गीतमिव त्यक्त्वा हेत्वर्थित्वं वचो मम ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

राजन्‌, सुनने के बाद “इसमें मेरा हित ही है” इस प्रकार की बुद्धिपूर्वक भावना करते हुए आप तर्कवाद का परित्याग कर "मधुर गीत की नाई" मेरे इन वचनों को प्रीति से सुनिये ओर उनको प्रामाण्यबुद्धि से ग्रहण कीजिए