Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
चूडालोवाच ।
यथा बालः पितुर्वाक्यं मुक्तहेतूपपादनम् ।
आदत्ते हि तथैव त्वं गृहाणैतद्वचो मम ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
चूडाला
ने कहा : राजन्, जैसे बालक हेतुओं से उपपत्तिशून्य अपने पिता के वचनों को प्रमाणबुद्धि से ग्रहण
करता है, वैसे ही आप मेरे इन वचनों को ग्रहण किजीए