Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 88, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 88, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

दुःखानि मौर्ख्यविभवेन भवन्ति यानि नैवापदो न च जरामरणेन तानि । सर्वापदां शिरसि तिष्ठति मौर्ख्यमेकं कृष्णं जनस्य वपुषामिव केशजालम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

इन सव बातों से यह निष्कर्ष निकला कि एकमात्र मूर्खता ही दुःख में सबसे बढ़-चढ़कर कारण है, ऐसा उपसंहार करते है । मूर्खता के विभव से जो दुःख उत्पन्न होते हैँ वे दुःख सर्वस्वनाश आदि बड़ी-बड़ी आपत्तियों से या बुढौती से या मरण से नहीं होते, तत्त्ववेत्ता ओं को सेकडों आपत्तियों के आने पर भी दुःख दिखाई नहीं देता ओर सोने के पलंगों पर सो रहे राजाधिराज को भी मूर्खता के कारण सैकड़ों दुःख दिखाई देते हैं, इससे सम्पूर्ण आपत्तियों के सिर पर एकमात्र मूर्खता उस प्रकार अवस्थित रहती है, जिस प्रकार पुरूष के सिर पर काला केशजाल