Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 89, Verses 12–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 89, verses 12–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 12-28
संस्कृत श्लोक
तं पुरः पतितं दृष्ट्वा महेभः करुणां ययौ ।
स्फुरत्स्फारगुणाः सन्तः सन्ति तिर्यग्गतावपि ॥ १२ ॥
पतितं दलयामीति किं नाम मम पौरुषम् ।
वारणोऽपीति कलयन्न जघान स तं रिपुम् ॥ १३ ॥
केवलं निगडव्यूहं विदार्याभिजगाम ह ।
विततं सेतुमुत्सार्य विपुलौघ इवाम्भसः ॥ १४ ॥
दयामाश्रित्य मातङ्गो भङ्क्त्वा जालं जगाम ह ।
विदार्य मेघसंघातं नभसीव दिवाकरः ॥ १५ ॥
गते गजे समुत्तस्थौ हस्तिपः स्वस्थदेहधीः ।
गजेनैव समं तस्य व्यथा दूरतरं गता ॥ १६ ॥
प्रोच्चलत्तालशिखरात्स तथा पतितोऽपि सन् ।
न भेदमाप दुर्भेदा मन्ये देहा दुरात्मनाम् ॥ १७ ॥
वर्धते प्रावृषीवाभ्रं कुकार्येष्वसतां बलम् ।
आसीदधिकमुत्साही स च चंक्रमणे तदा ॥ १८ ॥
वारणारिरसिद्धाङ्गो गतेभो दुःखमाययौ ।
आगत्योपगतेऽन्तर्धिं निधान इव वर्धनः ॥ १९ ॥
सोऽन्वियेष गजं यत्नाद्गुल्मकान्तरितं वने ।
पयोदपिण्डितं भोक्तुं राहुरिन्दुमिवाम्बरे ॥ २० ॥
चिरेणालभतेभेन्द्रं कस्मिंश्चित्कानने स्थितम् ।
विश्रान्तं तं तरुतले समरादिव निर्गतम् ॥ २१ ॥
अथ यत्र स्थितो नागस्तत्र तद्बन्धनक्षमम् ।
परया राजसामग्र्या गजलम्पटभूमया ॥ २२ ॥
स खातवलयं चक्रे हस्तिपः काननेऽभितः ।
सर्वदिक्कं विधिर्भूमौ समुद्रवलयं यथा ॥ २३ ॥
उपर्यस्थगयद्वाललतौघेन स तं शठः ।
शून्यतातन्तुजालेन शरत्काल इवाम्बरम् ॥ २४ ॥
दिनैः कतिपयैरेव वारणो विहरन्वने ।
तस्मिन्निपतितः खाते शुष्काब्धाविव पर्वतः ॥ २५ ॥
व्रजन्पर्याकृतौ कूपे पातालतलभीषणे ।
खातशुष्काब्ध्यधोभागे गजरत्नसमुद्गके ॥ २६ ॥
इति भूयो दृढं बद्धस्तेन हस्तिपकेन सः ।
तिष्ठत्यद्यापि दुःखेन भूसद्मनि यथा बलिः ॥ २७ ॥
अहनिष्यत्पुरैवासौ यद्यग्रे पतितं रिपुम् ।
तन्नालप्स्यत्ततो दुःख गजः खातनिबन्धनम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
सामने गिरे हुए उस शत्रु को देखकर महान् हाथी करुणा से भर गया, क्योकि
तिर्यक् योनियों मेँ जाने पर भी सन्त लोग प्रकाशशील अपने विशुद्ध गुण से युक्त ही रहते है । “गिरे हुए
को यदि मैं मार डालूँ, तो उसमें मेरा पुरुषार्थ ही क्या ?' इस प्रकार उस हाथी ने विचारकर उस शत्रु को
न मारा। एकमात्र लोहमय जाल का विदारण कर वह उस प्रकार चला गया, जिस प्रकार विस्तृत पुल का
विदारण कर जल का महान् प्रवाह चला जाता है । दया का आश्रय कर श्रृंखला जाल का भेदनकर हाथी
ऐसे चला गया, जैसे आकाश में मेघो का भेदनकर सूर्य चला जाता हे । जब हाथी चला गया तब महावत
स्वस्थमति होकर उठा। उसकी व्यथा हाथी के साथ-साथ ही दूर भाग गयी । उत्तुंग ताल वृक्ष के शिखर
से उस प्रकार गिरा हुआ भी वह सिर, पैर आदि अंगों से विकृत न हुआ। मेरा मत हे कि दुष्ट चेताओं की
देह दुर्भेद्य ही होती हे । वर्षाकाल में मेघो की नाई कुकर्मो में असत् पुरुषों का बल बढ़ता हे । वह पैरों से
चलने में अत्यन्त उत्साही था। हाथी का शत्रु वह महावत अपने उपायों में निष्फल सिद्ध हुआ । उसके
हाथ से हाथी चला गया । वह उस प्रकार दुःखी हुआ, जिस प्रकार हाथ मेँ निधि के आकर चले जाने पर
व्यापारी वैश्य दुःखी होता हे । अन्त में बहुत परिश्रम से वह अरण्य में झाड़ियों में छिपे हुए हाथी का उस
प्रकार अन्वेषण करने लगा, जिस प्रकार खा जाने के लिए आकाशमण्डल मे मेघो से छिपे हुए चन्द्रमा का
राहु अन्वेषण करता है। बहुत काल के बाद युद्धभूमि से मानों निकला हुआ किसी एक जंगल में स्थित
वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहा वही गजेन्द्र उसे फिर मिला । तदनन्तर जहाँ वह हाथी खडा था, वहीं पर
समीप में अनेक गजलम्पट जनों से युक्त उत्तम गङ़ा खोदने की राजसामग्री से उस महावत ने गजबन्धन
में समर्थ चारों ओर गोल जंगल में गङ़े का निर्माण किया । वह ऐसा लगता था, मानों भूमि में ब्रह्माजी
द्वारा निर्मित सर्वदिगृव्यापी गोल समुद्र हो । उस वंचक महावत ने उस गड्ढे को कोमल लताओं से उस
प्रकार ऊपर से ढक दिया, जिस प्रकार शरत्काल शुभ्र मेघपटल से आकाश को ढक देता हे । कुछ ही
दिनों के अनन्तर वन में विहार कर रहा वह हाथी, शुष्क सागर में पर्वत की नाई, उस गड्डे में गिर गया।
गजरूप रत्न के आश्रय तथा पातालतल के सदृश अतिभीषण वलयाकार कुएँ के शुष्क सागर-जैसे गड्ढे
के नीचे भाग में इस रीति से पुनः उसने उस हाथी को सुदृढ़रूप से बाँध दिया, जो आज भी बलि के
(00) बलिराज से यज्ञ में तीन पैर मात्र भूमि का प्रतिग्रह कर पहले पैर से समस्त पृथिवी, दूसरे से
स्वर्ग इस प्रकार क्रमशः तीसरे पैर की पूर्ति के लिए मेरु से बलि के सिर पर भगवान् वामन जैसे गिरे,
वैसे ही महावत क्रमशः पहले तालवृक्ष पर चढ़ा और फिर हाथी के सिर पर गिरा, यह तात्पर्य है ।
सदृश भूगर्भ में दुःखपूर्वक अवस्थित हे । यदि पहले यह हाथी अपने सामने गिरे हुए शत्रु को मार डालता,
तो कूपबन्धनरूप दुःख प्राप्त नहीं करता