Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 89, Verses 8–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 89, verses 8–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 8-11
संस्कृत श्लोक
दन्ताभ्यां यत्नतस्ताभ्यां मुहूर्तद्वितयेन सः ।
बभञ्ज शृङ्खलाजालं स्वर्गार्गलमिवासुरः ॥ ८ ॥
तं तस्य निगडच्छेदमपश्यद्दूरतो रिपुः ।
बलेः स्वर्गावदलनं हरिर्मेरुतलादिव ॥ ९ ॥
तस्य विच्छिन्नपाशस्य मूर्ध्नि तालतरो रिपुः ।
पपात क्रमतः स्वर्गं हरिर्मेरोर्बलेरिव ॥ १० ॥
स पतन्पादपद्माभ्यामप्राप्य करिणः शिरः ।
पपातोर्व्यां फलं पक्वं वाताहतमिवाकुलः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
दो मुहूर्तो में बड़ प्रयत्न से उस हाथी ने अपने उन समर्थ दो दाँतों से उस श्रृंखलाजाल को उस प्रकार
छिन्न-भिन्न कर दिया, जिस प्रकार बलिराज ने स्वर्गपुरी अमरावती के किवाड के सिक्कड को छिन्न-
भिन्न कर दिया था दूर से शत्रु ने उसका वह जाल-छेदन उस प्रकार देखा, जिस प्रकार श्रीहरि ने
मेरुतल से बलि का स्वर्ग-छेदन देखा था । जिसका फन्दा विच्छिन्न हो गया था, उस हाथी के सिर पर
वह शत्रु तालवृक्ष के ऊपर पहले चढ़कर फिर वहीं से उस प्रकार गिरा, जिस प्रकार क्रम से ()) मेरूपर्वत
पर से भगवान वामन बलि के सिर पर गिरे थे। गिर रहा वह अपने चरण कमलों से हाथी का सिर न प्राप्त
कर व्याकुल होता हुआ पृथिवी पर उस प्रकार गिरा, जिस प्रकार वायु से आहत पका फल पृथिवी पर
गिरता है