Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 89, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 89, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
मौर्ख्यं हि बन्धनमवेहि परं महात्मन्बद्धो न बद्ध इति चेतसि तद्विमुक्त्यै ।
आत्मोदयं त्रिजगदात्ममयं समस्तं मौर्ख्ये स्थितस्य सहसा ननु सर्वभूमिः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे अज्ञान ही मूलभूत बन्ध है, उसकी निवृत्ति अद्वितीय आत्मतत्त्वज्ञान से ही होती है, यह
दिखलाते हुए उपसंहार करते हैं।
हे महात्मन्, "सदा बन्धनशून्य भी मैं बद्ध हूँ” इस प्रकार की चित्तगत मूर्खता को ही आप सबसे
बढ़ा-चढ़ा बन्धन समझिये । अतः उससे विमुक्त होने के लिए आत्मा से उत्पन्न आध्यात्मिक आदि
समस्त तीनों जगत् को आत्मस्वरूप ही समझिये | इस तरह समझ जाने पर आत्मातिरिक्त किसी
वस्तु के न रहने से पुरुष नित्य मुक्त हो जाता है। जिसे इस तरह का ज्ञान नहीं है और जो मूर्खता
में ही अवस्थित रहता है उस पुरुष के लिए तो स्वयं आत्मा ही तत्काल समस्त बन्धनो के बीजों की
भूमि हो जाती है