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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 90, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । मणिसाधकविन्ध्येभबन्धनाद्यमरात्मज । सूचितं यत्कथाजालं पुनर्मे प्रकटीकुरु ॥ १ ॥ चूडालोवाच । वाक्यार्थदृष्टेर्निष्पत्त्या हृद्गृहे चित्तभित्तिषु । शृणु स्वयं कथां चित्रां चित्रमुन्मीलयामि ते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा शिखिध्वज ने कहा : हे देवपुत्र, चिन्तामणि के साधक तथा विन्ध्याचल के हाथी के बन्धन आदि का जो कथाजाल आपने सूचित किया है, उसे फिर मेरे सामने प्रकट कीजिये, क्योकि वह मेरे चरित्र से कुछ मिलता-जुलता-सा है, इस तरह की पूर्वोक्ति से आपने सूचित किया कि वह मेरे ज्ञान का उपायस्वरूप हे । चूडाला ने कहा : राजन्‌, आपके हृदयरूपी घर में चित्तरूपी दीवारों के ऊपर मैंने वाक्यार्थज्ञानसम्पादन द्वारा विचित्र कथारूपी चित्र की केवल रेखा ही खींच दी थी, अब उसे मैं व्याख्यारूपी विचित्र वर्णो से (रंगों से) रंग रहा हूँ , आप स्वयं सुनिये

सर्ग सन्दर्भ

नवासीवाँ सर्ग समाप्त नब्बेवाँ सर्ग कुम्भरूपिणी चूडाला द्वारा चिन्तामणि और कोच के सुन्दर आख्यान का विस्तार से तात्पर्यवर्णन ।