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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 90, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

योऽसौ शास्त्रार्थकुशलस्तत्त्वज्ञाने त्वपण्डितः । रत्नसंसाधकः प्रोक्तः स त्वमेव महीपते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

उन कथाओं में सर्वप्रथम “अस्ति कश्चित पुमान्‌ श्रीमान्‌“ (कोई एक श्रीमान्‌ पुरुष था) इत्यादि से मैने जिस चिन्तामणिसाधक का आपसे वर्णन किया है, वह आप ही है। हे राजन्‌, शास्त्रार्थ में कुशल, किन्तु तत्त्वज्ञान मेँ अपण्डित जिस चिन्तामणिरत्न के साधक का मैंने आपसे वर्णन किया है वह आप ही हैं