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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 90, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

तज्ज्ञो भवसि शास्त्रेषु रविर्मेरुतटेष्विव । तत्त्वज्ञाने तु विश्रान्तो न त्वं दृषदिवाम्भसि ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

"कलावान्‌ शास्त्रकुशलः ' इत्यादि जो कुछ लक्षण मैंने कहे हैं, वे सब आपमें घटते हैं। जिस तरह भगवान्‌ सूर्य सुमेरु के तटों के विषय में तत्त्वज्ञ है उसी तरह आप शास्त्रों के विषय में तो तत्त्वज्ञ हैं ही, किन्तु आत्मतत्त्वज्ञान में उस तरह विश्रान्त नहीं हैं, जिस तरह जल में पत्थर