Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 9, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
पयस्तरङ्गयोर्द्वित्वभावनादेव भिन्नता ।
विद्याविद्यादृशोर्भेदभावनादेव भिन्नता ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए विद्या ओर अविद्या का भेद भी कल्पित ही है, यह सिद्ध हुआ, ऐसा कहते हैं।
जैसे जल और तरंग की द्वित्वभावना से ही भिन्नता है, वैसे ही विद्या ओर अविद्या की दृष्टि में
भेदभावना से ही भिन्नता हे, वस्तुतः नहीं; जिस प्रकार परमार्थतः जल ओर तरंग की एकरूपता ही है,
उसी प्रकार अविद्या ओर विद्या भी एकरूप ही है, पृथक् कुछ भी नहीं हे