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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 9, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । संवेद्येनापरामृष्टं शान्तं सर्वात्मकं च यत् । तत्सच्चिदाभासमयमस्तीह कलनोज्झितम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, चूँकि निर्विकार शुद्धचित्‌ का घी की नाई स्वतः घनीभाव या मूर्ताकार हो नहीं सकता, इसलिए वे दोनों मायाधीन विर्वत युक्त ही हैं, यह मानना पडेगा। परन्तु श्रुतिप्रतिपाद्य निर्विकार पर्रह्मस्वरूपता के साथ विरोध न हो, इसलिए विवर्तत्व-प्रयोजक माया का अंश स्वच्छ, सूक्ष्मतम स्वरूप का अनावारक कहा जाता है, उसीको शुद्धसत्त्व कहते हैं, शुद्धसत्त्व अत्यन्त स्वच्छ, चित्प्रतिबिम्बका ग्राहक, सर्वविद्या का उद्दीपक, स्वरूप का अनावारक है, इसलिए प्रकृत में सर्वाधिपतित्व का विरोध नहीं हो सकता । यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत तत्‌ केन कं पश्येत्‌”, भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः“ इत्यादि श्रुतियों से हम लोगों के तत्त्वज्ञान से बाध्य होने के कारण उक्त अंश में अविद्यारूपता है, इसलिए यहाँ पर कोई असंभावना है ही नहीं, इस आशय से उत्तर देने की इच्छावाले श्रीवसिष्ठजी उक्त कल्पनाक्रम का उपक्रम करने के पहले सर्वप्रथम अधिष्ठान का दिग्दर्शन कराते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : संवेद्य से (जगदाकार से) रहित, सर्वविध उपद्रवों से वर्जित, समस्त जगत के संस्कार से संयुक्त माया से शवल होने के कारण सर्वात्मक अतएव सच्चित्प्रकाश से प्रचुर, कल्पनाओं से निर्मुक्त एकमात्र सत्स्वरूप ब्रह्म ही जगत की उत्पत्ति के पहले था